भौतिक सुख की नश्वरता और आत्मिक आनंद की अनंत गहराई
जीवन एक अनवरत यात्रा है, जिसमें हर यात्री सुख की तलाश में निकला हुआ प्रतीत होता है। कभी वह सुख एक गरमागरम, मसालेदार भोजन की सुगंध में छिप जाता है, कभी किसी प्रियजन की मुस्कान में, कभी ठंडी हवा में बहते फूलों की महक में, कभी किसी पुरानी धुन की मधुरता में, और कभी किसी सुंदर सायंकाल के रंगों में। ये सभी क्षण हमें इतना मंत्रमुग्ध कर देते हैं कि हम विश्वास कर बैठते हैं — यही सुख है, यही जीवन का सार है, यही सब कुछ है। परंतु जैसे ही समय अपनी चुपके-चुपके चलती हुई छड़ी से इन क्षणों को छूता है, वे एक-एक करके फीके पड़ने लगते हैं, जैसे सायंकाल के बाद अचानक अंधेरा छा जाना। इंद्रियों का जादू और उसका अंतिम पर्दा हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ — नेत्र, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा और त्वक् — ये पाँच द्वार हैं जिनके माध्यम से संसार हमारे भीतर प्रवेश करता है। जब ये द्वार पूरी तरह खुलते हैं, जीवंत होते हैं, तीव्र होते हैं, तब संसार का प्रत्येक कण हमें आनंदित करने लगता है। एक युवा लड़का जब पहली बार किसी सुंदर लड़की की आँखों में देखता है, उसके हृदय में जो उमंग उठती है, वह उमंग नेत्रों की प्...